
पता नहीं क्यों दुनिया भर के
हम पर ही सब तीर चले हैं।
चंचल,मस्त फुदकती,उड़ती
पंख हमारे उन्हें खले हैं।
रोके कहां भला रुकते हैं
उड़ने को आतुर ये पखने।
सीना चीर अनंत गगन का
बढ़ती हूं नव मंजिल गढ़ने।
गति मेरी जो चले बांधने
वही बाज के लिए भले हैं।।
लघु तन में भर वृहद हौंसले
चहक रही हूं,महक रही हूं।
नहीं हारती , उम्मीदें हैं,
बाधा से भयभीत नहीं हूं।
शुचिता, नमिता,भ्रमणशीलता
के जीवन में रंग ढले हैं।।
हरियल बगिया उजड़ रही है
जैव विविधता फिसल रही है।
सभी परिस्थिति बदल रही है
रेत हाथ से निकल रही है।
कौन शुद्धि का हवन करे अब
हाथ सभी के हुए जले हैं।।
सतीश चन्द्र श्रीवास्तव
रामपुर मथुरा, जिला सीतापुर




