साहित्य

भूख़ा आज भी रमुआ

अशोक आनन

आदमी !
परेशान है ।

काग़ज़ों में –
अमीर है ।
आज भी जो –
फ़कीर है ।

खलिहान में –
न धान है ।

वो रहा न –
आज बेघर ।
बग़ैर छत का –
चाहे घर ।

उखड़ी घर –
दालान है ।

घर में –
बस्तर – झाबुआ ।
भूख़ा –
आज भी रमुआ ।

गिरवी घर –
मुस्कान है ।

ऑंखें –
मोसिमराम हैं ।
खीसे में –
न छदाम है ।

जीवन –
बना लगान है ।

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सुधी पाठकों !
अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से नवाजे ।

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