
झरोखा बनाया ममता का
और लगा प्यार का साँकल
बच्चे को है दूध पिलाती
ऐसा होता माँ का आँचल
आँचल दियना को जुड़ाता
आँचल पवन को है डुलाता
सब पुण्य-प्रसाद मंदिर से
आँचल की झोली में आता
प्रीति बटोर कर आँचल में
बिटिया जाती है ससुराल
खुशियाँ समेटे आँचल में
मायके आती है खुशहाल
आँचल जब सिर पर है होता
तो जंगल में भी मंगल होता
जैसे अभिराम सरोवर में
शतदल ही शतदल हो दिखता
यादें सजो लिया आँचल में
पूंजी की गांठें आँचल में
शिशु का पावन शरणगाह
माँ के सुन्दर से आँचल में
आँचल नारी की महिमा है
आँचल मे उसकी गरिमा है
नारी से भी बढ़कर उसके
आँचल का ये तो करिश्मा है
आँचल प्रेम पर न्योछावर
कोई न आँचल के बराबर
आँचल में मिलती है दुआएं
माँगी जाती जब फैला कर
दुपट्टा,चुनरी और आँचल
कुछ समता इनमें तो हर पल
इनकी गाथा रहे सुरक्षित
ज्यों भागीरथी की कल-कल
आता जब उत्सव का मौसम
घर में होता,पूनम-पूनम
बेटी,बहन को मिलता भेंट
आँचल,नेग-स्नेह का संगम
धरा पर नेह, लुटाये बादल
खिल उठे धरती का आँचल
चंदा चुराये निशा से काजल
नारी का हो पुलकित आँचल।
रविशंकर शुक्ल
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