साहित्य

गृहलक्ष्मी की आवाज़

ज्योती कुमारी

🌸 गृहलक्ष्मी की आवाज़ 🌸

अपने मन का रोल कहाँ सभी को मिल पाता है,
किस्मत भी तो बस कुछ बहू-बेटियों की खिल पाता है।

जिन्हें कोई आवाज़ नहीं देता इस जहाँ में,
वो दीवारों की सरगोशियाँ तक सुन लेती हैं ध्यान में।

जब चमकना होता है, तो वो चमक ही जाती हैं,
दहलीज़ के अंदर रहकर भी, इतिहास लिख जाती हैं।

बात न कीजिए हरदम चाँद-सितारों की,
फिक्र भी रखिए अपनी घर की गृहलक्ष्मी की।

माँ के आँचल का मान अगर रख पाते,
तो शायद किस्मत इतनी बेरहम न कहलाती।

गीतों को, सपनों को, वो खुद ही दफ़न कर जाती,
बच्चों की परवरिश में अपना किरदार भूल जाती।

कभी वो भी अपने ज़माने की मुमताज़ थी,
बस अब तो चुपचाप एक फ़र्ज़ में आबाद है।

बात न करिए हरदम चाँद-सितारों की,
फिक्र भी रखिए अपनी घर की गृहलक्ष्मी की।

ज्योती कुमारी

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