साहित्य

गिरा के ख़ुद को

कनक

गिरा के ख़ुद को भी आंखों कहकहा लूट लिया
किया उसी ने भी धोखा अन कहा लूट लिया।।//१//

नज़र लगी किसकी हैं मुझे अभी भी लगता
मगर यहां पे ठहर के फ़लसफ़ा लूट लिया।।//२//

नज़र बड़ी थी छुपी सी सितम दे कर भी ज़ालिम
मुझे कसम दे के जाने मुस्कुरा लूट लिया।।//३//

कभी भी ख़ुद को न केवल जुड़ा के रक्खा था
ज़र्रा ज़र्रा में न देखा गुनगुना के लूट लिया।।//४//

फ़लक पे रख के सितारे गगन में ले जाते
दिया झुठा वो सितम फ़िर बुदबुदा के लूट लिया।।//५//

कनक

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