साहित्य

नर तन दुर्लभ है यहि जगत

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "

हे!प्रियवर,काव्य-सुधी जन
नर तन दुर्लभ है यहि जगत, दुर्लभ विद्यापति सोय,
दुर्लभ जग में कविता करन,दुर्लभ कवितामति होय।

कवि स्रष्टा होता है,सर्जक होता है। वह अक्षर ब्रह्म की उपासना कर, शब्दों का गुंफन कर, रचना का संसार खड़ा करता है,किन्तु ध्यातव्य व ज्ञातव्य है कि इस शब्दों के गुंफन में भावों का इत्र भी होना चाहिए अन्यथा कृतिकार के कृति सृजन का कोई औचित्य नहीं रह जायेगा। जैसे हम रसोई में दाल तो बहुत ही सुन्दर व यथेष्ट व्यंजित करें,किन्तु उसमें रामरस अर्थात् नमक का भाव देना भूल जायें तो वह व्यंजन नीरस निःस्वाद हो जायेगा। शिला खण्ड पर पथरकट और शिल्पकार दोनों ही काम करते हैं और उसे आकृति सुडौलता प्रदान करते हैं, किन्तु शिल्प धर्मी शिल्पकार अपने छेनियों के दंश से, अपने तक्षण कला से जो भाव भंगिमा अपने कृति में उकेरना है,भावों का सुसर्जन करता है उससे उसकी कलाकृति जीवन्त हो उठती है,प्राण प्रतिष्ठित हो, पूज्यनीय हो जाती है। साथ ही वह कालजयी कलाकार भी अपने कृति सृजन से अविस्मरणीय हो जाता है। तथैव आप भी सुरभित पुष्प से ही अर्चना के थाल को सजायें, वाग्देवी माँ सरस्वती के चरणों में अपने सुमन अर्पित करें, किंशुक पुष्प से नहीं।
🙏 नमो नमः🙏
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन ”
चलभाष-९३०५९८८२५२

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