
काल के कपाल पर लिखकर जो मिटाता था,
बिना रार ठाने भी जीत जो जाता था।
अंधेरों में सूरज का प्रकाश जो दिखाता था,
धरा का वो उज्जवल प्रभात आज ही जन्मा था।
टूटे तारों से बासंती स्वर सुन जो पाता था,
उम्र के बढ़ने को भी त्योहार जो मनाता था।
पत्थरों की छाती में नव अंकुर जो उगाता था,
माटी का वो स्वर्णिम लाल आज ही जन्मा था।
प्राची में अरुणिमा को जो देख पाता था,
हर दौर में गीत नये प्रगति के जो गाता था।
टूटे सपनों की सिसकी जो सुन पाता था,
हृदयों में बसने वाला सम्राट आज ही जन्मा था।
मन से कोमल विचारों से लौहपुरूष बन जाता था,
विरुद्ध समय में वाणी से अपनी हौसला जो दे जाता था।
वर्षों पहले जिजीविषा का ‘कमल’ जो खिलाता था,
ऐसा कर्मठ योद्धा यशस्वी विद्वान आज ही जन्मा था।
प्रेम जो स्वयं से ज्यादा देश से जताता था,
मानवता की राह पर स्वयं को चलाता था।
जन्मदिन पर वन्दन कर शत् शत् नमन उनको,
अजर अमर ‘अटल’ आज ही जन्मा था।
सतेन्द्र शर्मा ‘तरंग’
देहरादून।



