
दिनकर निकला है प्राची के छोर।
जाग सखे अब हुई सुहानी भोर॥
कोयल गाती गीत सुनाती बाग।
मधुकर मीठे धुन में गाए राग॥
कोमल किसलय डोल रहे हैं शाख।
कितने मीठे लगते हैं ये दाख॥
पवन बसंती की पायल के बोल।
अमराई में पंछी करें कलोल॥
मंदिर में नित बजते हैं अब शंख।
सुन्दर दिखता मोर पसारे पंख॥
रामू काका रोज बजाते ढ़ोल।
मीठे लगते हैं पपीहे के बोल॥
शाला में शिशु पढते हैं नित पाठ।
मनभावन मनमोहक है यह राठ॥
मन को अपने वश में कर लो पार्थ।
सद्गुण सार समाहित हो परमार्थ ॥
© डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




