साहित्य

मिर्ज़ा ग़ालिब गालिब, शायरी का बादशाह

डॉ.मुश्ताक़ अहमद

महान शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। मुग़ल बादशाहों के ज़माने में पैदा हुए गालिब ने उर्दू शायरी को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान था, और ‘ग़ालिब’ उनका तख़ल्लुस था, जो उनकी शायरी में गूँजता है। ग़ालिब की शायरी में इश्क़, दर्द, फ़लसफ़ा और ज़िंदगी की हक़ीक़तें बखूबी बयान होती हैं। उनका मशहूर शेर है,
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले।”यह शेर उनकी ग़ज़ल की रूह है, जो इंसान के अनगिनत तमन्नाओं को बयान करता है। ग़ालिब ने दिल्ली के दरबार में नवाबों और बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के साथ रहकर शायरी की महफ़िलें सजाईं। 1857 की क्रांति ने उनकी ज़िंदगी को तहस-नहस कर दिया, लेकिन उनकी क़लम न रुकी।उनकी दुआएं और शायरी आज भी दिलों को छूती हैं। ग़ालिब ने फ़ारसी और उर्दू दोनों में क़सीदे, मसनवी और ग़ज़लें लिखीं। उनकी किताब ‘दीवान-ए-गालिब’ उर्दू अदब की अमूल्य निधि है। ग़ालिब की शायरी में हास्य, विर्भाव और गहन चिंतन का अनोखा संगम है।आज 27 दिसंबर को उनका जन्मदिन मनाते हुए हम उनकी याद ताज़ा करते हैं। ग़ालिब साहब की शायरी हमें सिखाती है कि दर्द में भी हुस्न छिपा है। उनकी ये पंक्तियाँ अमर हैं,
“इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।”ग़ालिब की विरासत शायरी को अमर बनाए रखेगी।

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