साहित्य

खाक हो लेने तो दो

डॉ.उदयराज मिश्र

फिर कभी तुमसे कहेंगें दास्तां अपनी “उदय”,
आज अपनी बेबसी पर खूब रो लेने तो दो।।

राहें तक तक थक चुकीं आंखें कभी सोई नहीं-
आज बहते आंसुओं से होंठ धो लेने तो दो।।

याद मन करता जिन्हें जो भुला हमको दिये-
कल्पनाओं को मिलन के बीज बो लेने तो दो।।

जागती तन्हाइयों को शोर से मतलब कहाँ-
जल चुके अरमानों को खाक हो लेने तो दो।।
– डॉ.उदयराज मिश्र

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