साहित्य

बेटियां

*बेटियां*

बेटियाँ सुरक्षित रहें, इसके लिए क़ानून और कड़े बनें
बेटियाँ समाज की नींव हैं, भविष्य की निर्माता हैं।

लेकिन जब वही बेटियाँ डर के साये में जीने को मजबूर हों, तो यह व्यवस्था पर सवाल है।

क़ानून बने हैं, पर कठोर क्रियान्वयन अभी भी ज़रूरी है।
अपराधियों को त्वरित और सख़्त सज़ा मिले,
ताकि डर पीड़िता को नहीं, अपराधी को हो।

हर गली, हर स्कूल, हर सफ़र में
बेटी खुद को सुरक्षित महसूस करे—
यही एक सभ्य समाज की पहचान है।

बेटियों की सुरक्षा कोई विकल्प नहीं,
यह उनका अधिकार है।
अब समय आ गया है कि

क़ानून और भी कड़े हों,
और इंसाफ़ और भी तेज़।
तभी पीड़ित नही डरेगा
पीड़ा देने वाला डरेगा ll

पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर ✍️

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