साहित्य

दिसंबर

सुषमा दीक्षित शुक्ला

ये यादों के बक्शे ले आया दिसम्बर ।
मिले थे कभी अजनबी दो सड़क पर ।
वो घबरा रहा था कोई बात कहकर ।
वो शरमा गयी थी कोई बात सुनकर ।
ये यादों के बक्शे ले आया दिसम्बर ।
बेचैनियां थीं मदहोशियां थी ,
अजब जादुई लग रहा था वो आलम ।
पहचान कोई पुरानी नही थी
मगर लग रहा था मिले हैं कभी हम ।
युगों से जिन्हें ढूंढा करती थी दर दर ।
लगा पा लिया उनको फिर से धरा पर ।
ये यादों के बक्शे ले आया दिसम्बर ।
मिले थे कभी अजनबी दो सड़क पर ।
वो घबरा रहा था कोई बात कहकर ।
वो शरमा गयी थी कोई बात सुनकर ।
कहा भी नहीं कुछ सुना भी नही था ,
लिखी जा रही थी कहानी मिलन की ।
कोई अपना अपना सा लगने लगा था ,
वो नस नस की सिरहन हृदय की छुअन थी ।
कहाँ भूल पाना है उसको उमर भर ।
मिले थे प्रथम जिस नगर जिस डगर पर ।
वो रूहों से रूहों का रचता स्वयंम्बर ।
ये यादों के बक्शे ले आया दिसम्बर ।
मिले थे कभी अजनबी दो सड़क पर ।

सुषमा दीक्षित शुक्ला

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