साहित्य

यूं जला के दिल मेरा

कनक

यूं जला के दिल मेरा भी मनाता क्या है
गर मुहब्बत मुझसे फ़िर जलाता क्या है।।//१//

जल रहा हूं मैं भी तेरी ही हकीकत से अब
गर क़यामत तुझमें फिर भी डराता क्या है।।//२//

रास्ता गर है तो दिल से ही जुदा कर मुझको
हैं हक़ीक़त तुझमें तो भी दिखाता क्या है।।//३//

दर्द दरिया बन जाता है तो हाले दिल पे
ख़्वाब मेरे कुछ बिगड़े है सुनाता क्या है।।//४//

देखना है गर तुझको घाव में मत कर तू ग़म
बन क़यामत मुझ पे फिर तो बताता क्या है।।//५//

कनक

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