साहित्य

कह मुकरी

कविता ए झा

जब देखो ताव दिखावे।
बात- बात में पुलिस बुलावे।।
हर घड़ी बैठे ओढ़, रजाई ।
क्या सखि साजन! ना सखि फौजाई ।।१।।
✍️
चाल चले, वो आढी- टेढ़ी।
जैसे हो कोई? खम्भा सीढ़ी।।
बात-बात पर, करे लड़ाई।
क्या सखि साजन! न सखि लुगाई ।।२।।
✍️
रोज खाए होटल का खाना।
फिर लगाए चक्कर दवाखाना।
काम से बचने का है अच्छा बहाना।
क्या सखि साजन! ना सखि जनाना।। ‌।।३।।
✍️
आस करें घट जाए दंगा।
नव वर्ष में सब रहेगा चंगा।।
सुधर जाय अब सबकी गति
क्या सखि साजन! न सखि पति ।।४।।

– कविता ए झा
नवी मुंबई

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!