
सिर्फ तारीख ही तो बदलती है
किस तरह दूँ
नववर्ष की मुबारक़बाद सखी?
कुछ भी नया नहीं प्रकृति में,
न फूलों की सुगंध,
न भँवरों का गुंजन
नव जीवन, नव उमंग
का संदेश देने वाली
नव कोंपलें भी तो नहीं हैं।
खग विहीन अंबर,
ओढ़े कुहासे की चादर
पत्रविहीन वृक्षों के ठूँठ,
डराते हैं काली रातों में।
जरा सी तपिश की चाह में
ठिठुरते हाथ,और बदन
पंख समेटे, सिकुड़ कर बैठे पंछी,
बर्फीली हवाएं लिए सर्द रात,
केवल कुछ देर का कोलाहल
फिर अलसाई, उनींदी,ठिठुरती सुबह
न नव उमंग, न स्फूर्ति,
न नव ऊर्जा का आभास,
फिर किस तरह दूँ
नववर्ष की मुबारकबाद।
नववर्ष तो तब ही होता है
जब सिंदूरी भोर लिए आता है सूरज,
लेती है प्रकृति अंगड़ाई और
करती है नववधु सा श्रृंगार,
लजाती है धरा ओढ़ कर वासन्ती चूनर।
लहलहाते हैं खेत खलिहान
जब पीली सरसों झूमती है,
इठलाती हैं तितलियां फूलों पर
और भँवरे मधुमास मनाते हैं ,
बहती हैं नदियां कल -कल कर
झरने सँगीत सुनाते हैं।
अमराई पर गाती कोयल
जब मन में प्रीत जगाती है।
तब होता है नववर्ष सखी
फागुन की मस्ती छाती है।।
सुमन पंत’सुरभि’




