
कर्मानुसार होता रहता है,हरेक प्राणियों का पुनर्जन्म।
आत्मा कभी मरे न वो,अजर अमर अविनाशी जन्म।।
लखचौरासी योनियों में,दिन-रात विचरण करे आत्मा।
शांति न हो तब तक जब तक,मिलन नहीं परमात्मा।।
मानव के अच्छे-बुरे करम फल कारण पुनर्जन्म होता।
जीव-जंतु ,कीट पशु-पक्षी,इंसाँ स्वरूप जनम होता।।
तन इंसान पुनः मिला,तब प्रारब्ध-सुकर्मों का फल है।
मृत्यु से अन्य योनि में,आत्मा प्रवास दुष्कर्म फल है।।
प्रभु कृपा यह उम्र पूर्ण कर,मृत्यु सुनिश्चित होती यह।
आत्मा कभी मरे नहिं,पुनर्जन्म ले जीवित होती वह।।
जबतक मोक्ष नहीं मिलता है,तबतक है रहे भटकती।
आज इस कल दूजे तन में,पुण्यात्मा बसी अटकती।।
ईश्वर का ये अंश है होती,वह पुनर्जन्म लेती रहती है।
प्रभु मिलन को तड़पे,ईश प्राप्ति-मोक्ष हेतु है रहती।।
पुनर्जन्म तो कभी-कभी,हरेक प्राणी का होता रहता।
जिसका जस प्रारब्ध होता,उसका वैसे यह है रहता।।
मानव तन में जन्म मिला जो,मन ईश्वर भक्ति जगाएँ।
नेकी पुण्य दया धर्म में,आजीवन ईश गुणगान गाएँ।।
मोक्ष मिले जिससे जीवन को,यह भव पार हो जाएँ।
प्रभु मर्जी कब कौन रूप में,जन पुनर्जन्म में आएँ।।
इंसानी चोला मिले पुनः तो,शुचि सुंदर धर्म निभाएं।
परमेश्वर को शुक्रिया दें,जन कल्याणहित हो जाएँ।।
हे! प्राणी मानव तनधारी,सफल बना लो यह जन्म।
मौका शायद मिले दुबारा,होसके तुम्हारा पुनर्जन्म।।
*डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.




