
ठंडक धीरे-धीरे बढ़ने लगी,
रिश्तों की सिहरन उतरने लगी।
धुंध इतनी घनी छाई है राहों पर,
कि सच का साया भी ग़लतफहमी से पलने लगा।
चेहरे तो बहुत हैं आसपास
अपने-पराए की रेखा मिटने लगी है।
लबों पर मुस्कान, दिलों में दूरी,
पहचान अब शब्दों से झलकने लगी है।
इस मौसम ने बस इतना सिखाया,
हर चमकती आँख भरोसे लायक नहीं।
धुंध में इंसान को पहचानना मुश्किल है,
और आजकल इंसान में इंसान ढूँढना भी आसान नहीं है।
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर ✍️
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