
धरती माँ आज मौन खड़ी है,
आँखों में प्रश्न हजार,
मैंने सब कुछ दिया तुम्हें,
फिर क्यों मुझसे इतना उपेक्षाभार?
नील गगन, बहती नदियाँ,
हरियाली का था संसार,
आज धुएँ में घुटती साँसें,
रोता है जीवन बार-बार।
यह संकट केवल प्रकृति का नहीं,
मानव सोच का भी है दोष,
और इस सोच को बदल सकता है
बस एक जागरूक कुटुंब बोध।
घर की चौखट से सीख मिले,
संस्कारों का दीप जले,
पेड़ लगाना, जल बचाना,
हर दिन जीवन मंत्र बने।
माता-पिता जब सिखलाएँ,
प्रकृति है सबकी जननी,
बच्चों के मन में स्वतः जगे
धरती से सच्ची वंदनी।
एक घर अगर ठान ले आज,
मैं प्लास्टिक को छोड़ूँगा,
जल, जंगल, जमीन बचाकर
भविष्य को मैं जोड़ूँगा।
तो समझो बदलाव आया,
चुपचाप, बिना शोर,
कुटुंब प्रबोधन से ही बनता
सशक्त समाज का दौर।
कानून नहीं, डर नहीं चाहिए,
बस संस्कारों की धार,
जहाँ हर मन बोले—
प्रकृति मेरी जिम्मेदार।
आओ मिलकर प्रण लें हम,
धरती को स्वर्ग बनाएँ,
कम लें, अधिक लौटाएँ,
जीवन का अर्थ सिखाएँ।
क्योंकि जब तक पर्यावरण हँसता है,
तब तक मानव सुरक्षित है,
और कुटुंब प्रबोधन की राह ही
भविष्य की सच्ची युक्ति है।
सीता सर्वेश त्रिवेदी जलालाबाद शाहजहांपुर




