साहित्य

साल का अंतिम दिन

संजय मृदुल

सोच रहा हूँ
कैसे विदा करूँ
इस अतिथि को।
जो पाया अपरिमित उसके लिये
शुक्रिया कहूँ या
जो खोया प्रिय उसके लिए कोसूं
या फिर खोने पाने की भावना से
ऊपर उठकर विदा दूँ।
जाते हुए साल का हर पल
कर्ज लादता गया है मुझ पर
मुस्कान का कभी दर्द का
उल्लास का कभी निराशा का
जीत का कभी हार का
ये कर्ज बना रहेगा
आने वाले साल में भी ब्याज के साथ
और मैं सहर्ष चुकाता रहूंगा किश्तें
जीवन जीने का नाम है ना,इसलिए।।।
©संजय मृदुल
रायपुर

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