
सबके आँगन में नाच रही है रूहानी।
पर रूठ गई है मेरी अब प्रेम कहानी॥
ये कैसी तकदीर रब ने हमारी लिखवाया।
मेरी मेहबूब का कहाँ छुप गया साया॥.
सुनहरी भोर पूरब में लाली ले कर आई
मेरे तन मन पर गम की बदरा है छाई
कैसी हमदम पे मैं अपना दिल को लुटाया
अपने घर आँगन में ख़ुद गम को है पाया
रातें सिमट गई तन्हाई का आलम आया
निदिंया भी रुठ कर मन से उड़ता पाया
कैसी है ये प्रीत की रीत सितम जो ढाया
सुकुन भी मेरे पास आने से है घबराया
कभी मेरी भी थी वो शाम हँसीन सुहानी
रोज सुनाई करती भी प्रीत की रवानी
पर धोखा दे अनजाने में जग को हँसाया
खुद को मोहब्बत की दलदल में हूँ पाया
दिन के उजाले अब हमको क्यूं चिढ़ाता
मैं तो हूँ आज किस्मत का दीन विधाता
कब बजेगी मेरी घर में शादी की शहनाई
तंग आ चुका हूँ मैं नित्य की रातें तन्हाई
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




