
समय बहुत निर्दयी निकला,
सब कुछ उससे छीन लिया।
पति गया, सास-ससुर बिछुड़े,
जीवन ने विष पीना दिया।
तीन नन्हे मासूम चेहरे,
माँ की आँखें पढ़ते थे।
रोटी कैसे आए घर में,
चुपचाप यही सोचते थे।
सूना चूल्हा, खाली बर्तन,
घर में गहरा सन्नाटा था।
एक अकेली माँ के ऊपर,
दुःख का पूरा पहाड़ खड़ा था।
उस दिन जब वह टूट चुकी थी,
हिम्मत भी उत्तर दे बैठी।
याद अचानक बाबुल आए,
पलकों पर बरसात उतर बैठी।
पुराने घर के एक कोने में,
वह संदूक दिखाई दिया।
जिसे बरसों पहले बाबुल ने,
अपने हाथों से छुआ किया।
काँप रहे थे दोनों हाथ,
जब ताला उसने खोल दिया।
धूल हटाते ही भीतर जैसे,
पूरा बचपन बोल दिया।
लाल रेशमी कपड़े के भीतर,
वही थाली मुस्काई थी।
साथ रखा था चाँदी का गिलास,
जिसमें बाबुल की परछाईं थी।
थाली को जब माथे से छुआ,
सिसकी बनकर साँस ढली।
लगा अभी कह देंगे बाबुल—
“आ जा बेटी, रोटी खा ली।”
आँसू गिरकर पूछ रहे थे—
“क्यों इतना मजबूर हुई?”
थाली चुप थी, लेकिन उसमें,
पिता की ममता भरपूर हुई।
फिर बच्चों की भूखी आँखों ने,
माँ का सीना चीर दिया।
ममता ने उस दिन बेटी से,
अपना हर अभिमान लिया।
भारी मन से वह अमानत,
साहूकार को दे आई।
पर लगता था बाबुल ने ही,
फिर बेटी की लाज बचाई।
थाली बिकी, गिलास भी बिका,
पर बाबुल का प्यार न बिका।
सोना-चाँदी हाथों से छूटा,
उनका अमृत-दुलार न बिका।
उन्हीं रुपयों से बच्चों ने,
फिर से जीवन थाम लिया।
मरकर भी इक बूढ़े बाबुल ने,
अपना हर फ़र्ज़ निभा दिया।
बच्चों को जब रोटी मिलती,
माँ चुपचाप मुस्काती थी।
पर हर निवाले के संग-संग,
आँखें भी भर आती थीं।
कोई पूछे—”कैसे बची तुम?”
वह बस इतना कह देती थी—
“मेरे बाबुल आज भी मुझको,
मरकर भी रोटी देते हैं।”
आसमान की ओर देखकर,
बेटी फूट-फूटकर रोई थी।
“बाबूजी! मेरी हर साँस में,
आज भी आपकी ही रोशनी है।
जीवन भर उँगली थामे रखी,
अब भी साथ निभाया है।
मैं जब-जब गिरने वाली थी,
आपने ही बचाया है।
चाँदी की वह थाली बिकी,
गिलास भी घर से चला गया।
लेकिन मेरा बाबुल मुझसे,
आज भी कभी न जुदा हुआ।”
कहते-कहते फूट पड़ी वह,
यादों से लिपटकर रोकर।
“जिस दिन थाली बिकने आई,
उस दिन बाबुल जी उठे होकर।”
‘दिव्य’ कलम अब मौन हुई है,
शब्द सभी लाचार हुए।
बेटी रोई, घर भी रोया,
पत्थर तक अश्रुधार हुए।
जीते-जी माँ-बाबुल का,
हँसकर तुम सम्मान करो।
कल तस्वीरें बोलेंगी केवल,
आज उन्हें प्रणाम करो।
क्योंकि…
अनाथ केवल बच्चे ही नहीं होते,
सूने आँगन भी रोते हैं।
और कुछ बाबुल…
मरने के बाद भी
अपनी बेटियों को
रोटी खिलाते हैं…
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




