
अँधेरी निशा है,घिरी कालिमा है।
उजाले के दीपक जलाएँ चलो हम।
मधुरता भरी भावना साथ लेकर,
ले संकल्प स्वर्ग धरा पर लाएँ हम।
बिना त्याग- बलिदान के कुछ न होगा।
संकल्प सबको उठाना पड़ेगा।
पीड़ा -पतन निवारण में लगना होगा।
आत्मसाधना ,आत्म सुधार करना होगा।
हम गढ़ें आचरण की कथाएँ नई,
और जीवन -कला की प्रथाएँ नई ।
स्वर्ण -इतिहास युग का लिखा जा सके,
संकल्प दोहराएँ निर्मल व्यक्ति बने।
शत्रु है सबसे बड़ा अज्ञान उसको मारना।
डूबते जीवन कलश की डोर थाम उबारना।
दोष दुर्गुण बढ़ गए ,बीन बीन कर निकालना।
सत्यं शिवं सौंदर्य में फिर मनुज को ढालना।
बहुत हो चुका अब न विकृति बढ़ेगी,
युवाओं का मन अब मचलने लगा है।
सृजन श्रेष्ठ संकल्प लेकर बढ़ें हैं।
प्रखर ज्ञान का सूर्य उगने लगा है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




