
ब्रह्मतेजमय परसुराम प्रभु शत शत बार प्रणाम ।
दुष्ट नृपति के दर्प दलन कर किये पुण्यमय काम ।।
भृगुवंश के भव्य भानु तुम आभास कराया जग को ।
अंधकार था जहां आप किए आलोकित उस मग को।।
सत्य शाश्वत मारग को लख तुम रखना निज पग को ।
दृढ़ इच्छा शक्ति कर इतनी जो झुका देय हिम नग को ।।
शास्त्र शस्त्र को सम समझाकर किये कर्म अभिराम ।……….१
ब्रह्मतेजमय ………
आप तपोनिधि रौद्र रुप प्रभु शुभ शिव शिष्य कहाये ।
ब्रह्म ज्ञान विज्ञान विशारद गाम्भीर्य ज्ञान को पाये ।।
मातु रेणुका लाड़ प्यार कर प्रिय सुत गोद खिलाये ।
चतुर धनुर्धर परसु पाणि धर मृग चर्म कमर लिपटाये ।।
उर विशाल शुभ उन्नत भाल त्रिपुण ललाट ललाम ।………..२
ब्रह्मतेजमय …………
पितृ भक्ति पोषक तोषक प्रभु उद्घोषक आज्ञा कारी ।
मर्यादा का मान ध्यान धर तुम्ह भक्तन के भय हारी ।।
शिष्य कर्ण से सुर्य पुत्र जो महाभारत भये बलकारी ।
सप्त त्रियी दई दान धरा प्रभु विप्रन को तुम दै डारी ।।
द्रोण आचार्य के आप गुरुवर शुभ महाभारत में नाम ।……..३
ब्रह्मतेजमय …………….
महेन्द्राचल की महिमा भारी , जो तपस्थली तुम्हारी ।
सागर मध्य आज भी रहते , चिरजीवी कीर्ति तुम्हारी ।।
दास करें यह आस आपसे , प्रभु सुनलो विनय हमारी ।
शिव दर्शन को सुलभ करा दो , हे विप्रन के हितकारी ।।
मक्खन हिय हरि भक्ति भरदो , जो है शोभा सुख धाम ।…………..४
ब्रह्मतेजमय………………
डा राजेश तिवारी ‘मक्खन’
झांसी उ प्र




