
हम तो ठुकराए हुए बैठे हैं
आप बतलाएं किस हाल में,
बैठे हुए हैं!!
दर्द की कोई दवा मिल गई है
आप नज़रे चुराए बैठे हैं!!
तन्हाई में याद बहुत करते हैं
आप महफ़िल सजाए बैठे हैं!!
किस तरह दीजिएगा मुझको
मेरा हक़
ख़ुद को सांँप आस्तीन का,
बनाए बैठे हैं!!
आरज़ू है तो दफ़न कर दो मुझे
वर्ना हम तो मौत कलेजे से,
लगाए बैठे हैं!!
कुछ मिल गया तो मेरा नसीब
हम नसीब आजमाएं बैठे हैं!!
रोज़ -रोज़ करते हो तंग बहुत,
मुझको,
रोज झगड़ा लगाए बैठे हैं!!
सफ़र ज़िन्दगी का बहुत लंबा है
हमको मिल के पत्थर दिखाई,
देते हैं!!
हो सके तो बख़्शो ज़िन्दगी को,
क्या से क्या हम को बनाएं बैठे हैं!!
अब रुसवाईयों से डर नहीं लगता
अब हम गंगा नहाए बैठे हैं..!!
स्वरचित – राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान



