साहित्य

एन्जॉय कीजिये

संजय मृदुल

महंगाई में रोना कैसा,
एन्जॉय कीजिये
बैंक के लेनदेन पर सरचार्ज,
एन्जॉय कीजिये
जो मिलती नहीं सलीके से
उस शिक्षा पर उपकर,
एन्जॉय कीजिये।
कोसिए नहीं सरकार को
कोसिए नहीं सरकार को जनाब
उनकी घी चुपड़ी अपनी सूखी रोटी,
एन्जॉय कीजिये
टूटी सडकें, बहती नालियां
अपने कुल्हड़, उनकी प्यालियाँ
जो आप के दम पर हैं असरदार
उनके गुरुर का अभिशाप,
एन्जॉय कीजिये।
बढ़ती दौलत, बढ़ता रुपया
डूबते बैंक, विश्वव्यापी सम्मान
जीरो बैलेंस वाले खाते अपने,
एन्जॉय कीजिये
हर बात में तल्ख़ी, हर बात पर ताना
दो रुपये किलो अनाज में बिक जाना
चांवल बेच दारू की बोतलें,
एन्जॉय कीजिये।
चलने पर टोल पेटीएम वाला
खाने पर जीएसटी, गले में अटका निवाला
सिलेंडर के फेर में निकला दिवाला,
एन्जॉय कीजिये।
अस्पताल में लूट मची है
एअरपोर्ट में भीड़ जमी है
दुकानें पड़ी हैं खाली खाली
ऑनलाइन ख़रीदारी एन्जॉय कीजिये।
सब्जियों में लगी आग है
फ़लों की कीमत बेहाल है
भूखे रहीम से भजन न होता
पेड़ पर बांध कपड़ा, एन्जॉय कीजिये।
©संजय मृदुल

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