
ओम् मंत्र है आदि से,बना जगत आधार।
अनहद ध्वनि गुंजन करे, चेतनता विस्तार।
निराकार शुचि रूप है, शंभु करें कल्याण, नाम मंत्र के जाप से, भर जाता भंडार।।
करता मानव युद्ध क्यों, इस नश्वर संसार।
चार दिवस की जिंदगी, मिली हुई उपहार।
मानवता को भूल कर,रक्त पात पर जोर,
लेखा-जोखा बन रहा, प्रभुवर के दरबार।।
समय अभी है चेत ले,कर मानव उपकार।
द्वेष-दम्भ को त्याग दे,यही ज्ञान का सार।
वृद्धों का आशीष ले, माता-पिता गुरु मान,
तब शिव की बरसे कृपा, होगा भव से पार।।
खुश कैसे हम सब रहे, निर्भर करता आप।
चाहत जितनी हो अधिक,उतना ही संताप।
मन में हो संतोष यदि,दूर सभी व्यवधान,
सार्थकता हो जन्म की,कर लो प्रभु का जाप।।
डॉ गीता पाण्डेय ‘अपराजिता’
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश



