
इने में, जिंदगी
तलाश रहा था, पता चला
वहीं तो तुम ले गई
अपने साथ
मेरी जिंदगी ख़ुद से पूछती
तू ऐसी क्यों है, वह मुस्करा कर
बोली, में करोड़ों से अच्छी हूं
जिंदगी, जिंदगी से
बहुत सवाल करती
बेचारी क्या जाने
कलयुग की परिभाषा
कट गई जिंदगी सुख बांटने में
हम आज तक नहीं समझ पाए
सुख किस चिड़ियाँ का नाम है
जिंदगी तूने जैसा चाहा रहा
तूने क्या दिया, कभी सोचा
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश



