साहित्य

जल संरक्षण

आशा बिसारिया

सर्दियों का आग़ाज़ हो चुका था। क़श्मीर की हसीन वादी पर सफ़ेद बर्फ़ की चादर बिछने को बेताब थी। ‘श्रीनगर’ से कुछ मील दूर, पहाड़ के दामन में बहती ‘झेलम नदी’ के किनारे, चौड़े चक्कों वाली लकड़ी की पहाड़ी बैलगाड़ी के साथ एक बीस-बाईस साल का नौजवान खड़ा था। उसका नाम ‘यावर’ था। यावर इस पहाड़ी इलाक़े का सीधा, सादा और मासूम इंसान था, जिसकी दुनिया बस उसकी गाड़ी और उसके दो वफ़ादार बैल—’शमशेर’ और ‘जाँबाज़’ थे। यावर का दिल वादी के चिनार के पत्तों की तरह साफ़ और पाकीज़ा था। वह अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक छोटे से मकान में रहता था और नदी किनारे से सामान ढोकर अपना गुज़ारा करता था।

शाम ढल रही थी, और पहाड़ों से उतरती हुई धुंध (कोहरा) सब कुछ अपनी आगोश में ले रही थी। तभी नदी के घाट पर एक अजीब सी हलचल हुई। शहर से आई एक मशहूर ड्रामेबाज़ और नौटंकी मंडली का साज़-ओ-सामान वहाँ बिख़रा पड़ा था। उनकी गाड़ी का पहिया पहाड़ी ढलान पर धँसकर टूट चुका था।

उस मंडली के दरमियान एक लड़की खड़ी थी, जिसने कश्मीरी ” पारंपरिक लिबास पहन रखा था, लेकिन उसकी आँखों में शहर की थकावट और ख़ौफ़ था। वह थी ‘ज़ून'(जिसका मतलब है चाँद)। ज़ून उस मंडली की मुख्य गुलूकारा (गायिका) और अदाकारा थी। उसकी आवाज़ में वो कशिश थी कि पहाड़ों के झरने भी ठहर कर उसे सुनते।

यावर ने जब उस लाचार लड़की को ठंड से ठिठुरते देखा, तो उसकी पहाड़ी शराफ़त जाग उठी। उसने अपनी गाड़ी आगे बढ़ाई और बेहद शर्मीले लहज़े में अपनी टोपी संभालते हुए कहा,

“मोहतरमा, रात गहरी हो रही है और बर्फ़ गिरने वाली है। अगर आप मुनासिब समझें, तो मेरी इस अदना सी गाड़ी में बैठ जाएँ। मैं आपको महफ़ूज़ (सुरक्षित) मुक़ाम तक पहुँचा दूँगा।”सुरों का जादू और ख़ामोश इश्क़

ज़ून ने यावर की साफ़ और बेग़र्ज़ आँखों में देखा, जहाँ कोई चालाकी नहीं थी। वह दुनिया के फ़रेबियों को देख चुकी थी, पर इस नौजवान के चेहरे पर एक अजीब सा नूर और सच्चाई थी। वह चुपचाप गाड़ी के पिछले हिस्से में बैठ गई। जैसे ही यावर ने बैलों को हाँका—”हुर्रऽऽ शमशेर! चल जाँबाज़!”बैलों के गलों में , बंधी पीतल की घंटियाँ इस तरह बज उठीं जैसे कोई साज़ छिड़ गया हो।

सन्नाटे को चीरती हुई घंटियों की आवाज़ के बीच, ज़ून के होंठों से एक क़श्मीरी नज़्म फूट पड़ी।

इश्क़ की वो आग कैसे बुझाऊँ, जो दिल में सुलग रही है…

यावर के हाथ से बैलों की रास छूटते-छूटते बची। उसने कभी ऐसी रूहानी आवाज़ नहीं सुनी थी। उसे लगा जैसे पहाड़ की वादियों में मल्लिका-ए-हुस्न उतर आई हो। वह ज़ून को कोई मामूली नाचने-गाने वाली नहीं, बल्कि जन्नत की हूर समझने लगा। पूरे रास्ते यावर अपनी तुतली और सादा ज़बान में उसे पहाड़ों के क़िस्से, झेलम के मिज़ाज और अपने बैलों की आदतें सुनाता रहा। ज़ून, जो अब तक दुनिया के मतलबी और अय्याश लोगों से घिरी रही थी, यावर की इस पाकीज़ा मासूमियत पर अपना दिल हार बैठी। दोनों के बीच बिना कुछ कहे एक ख़ामोश रिश्ता पनप चुका था। ज़ुल्म की दीवार और बग़ावत,,,

सालाना पहाड़ी मेले के मैदान में मंडली के तंबू गाड़े जा चुके थे। कई रातों तक यावर अपनी बैलगाड़ी किनारे खड़ी करके, सबसे आगे बैठकर ज़ून के सुरों की इबादत करता रहा। ज़ून भी मंच पर आते ही सबसे पहले भीड़ में यावर का वो सादगी से भरा चेहरा तलाश करती। दोनों ने एक-दूसरे से कभी ज़ुबान से इक़रार नहीं किया, मगर आँखें सब कह चुकी थीं।

लेकिन इस मासूम इश्क़ की तक़दीर में एक तूफ़ान आना बाक़ी था। मेले का आख़िरी दिन था। मंडली का ज़ालिम मालिक ‘लाला रहमान’ ज़ून को एक रईस और अय्याश ज़मींदार के हवाले करने का सौदा कर चुका था। रात के पिछले पहर, तंबू के पीछे ज़ून रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी, मगर रहमान उस पर ज़ुल्म ढा रहा था और उसे ज़बरदस्ती महफ़िल में भेजने की तैयारी कर रहा था।

तभी अंधेरे को चीरता हुआ यावर वहाँ पहुँच गया। अपनी ज़ून की आँखों में आँसू और उसकी आबरू पर ख़तरा देखकर इस सीधे-सादे पहाड़ी नौजवान के भीतर का लाचार इंसान मर गया, और एक शेर जाग उठा। उसने आव देखा न ताव, लाला रहमान और उसके गुंडों पर अपनी गाड़ी हाँकने वाला चाबुक तान दिया। उसने अकेले ही उन सब पर धावा बोल दिया और उन्हें पीछे धकेल दिया। इस अफ़रा-तफ़री के बीच, यावर ने ज़ून का हाथ थामा और उसे लेकर सीधे अपनी बैलगाड़ी की तरफ़ भागा

झेलम नदी के किनारे बर्फ़ की हल्की फुहारें गिर रही थीं। ज़ून बुरी तरह घबराई हुई थी, “यावर! तुम नहीं जानते ये लोग कितने ख़तरनाक हैं। वे पुलिस को बुला लेंगे, तुम्हें मार डालेंगे। मुझे छोड़ दो यावर, मैं एक बदनसीब नौटंकी वाली हूँ। मेरी तक़दीर में यही ज़ुल्म लिखा है। तुम अपने घर जाओ।”

यावर ने ज़ून के काँपते हुए हाथों को अपने मज़बूत और गर्म हाथों में ले लिया। उसकी आँखों में अब कोई झिझक नहीं थी, सिर्फ़ एक अटूट फ़ैसला था। उसने संजीदा लहजे में कहा।

“ज़ून! इस ज़मीन पर ख़ुदा ने तुम्हें सिर्फ़ सुर बख्शे हैं, किसी की ग़ुलामी नहीं। ये पहाड़, ये नदी गवाह हैं कि यावर तुम्हें उस जहन्नम में वापस जाने नहीं देगा। अगर यह गाँव हमारे पाक इश्क़ का दुश्मन बन चुका है, तो हम इस जगह को हमेशा के लिए छोड़ देंगे। जहाँ तुम होगी, वहीं मेरा वतन होगा।”

यावर ने गाड़ी पर क़श्मीरी शॉल का परदा गिराया, ज़ून को अंदर बिठाया और अपने बैलों को पुकारा—”शमशेर! जाँबाज़! आज लाज रख लेना भाई!”

पीछे से मशालें लिए गुंडों की चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं। मगर यावर की गाड़ी अब तूफ़ान बन चुकी थी। पत्थरों और बर्फ़ीले रास्तों को चीरती हुई बैलगाड़ी पहाड़ों के उस गुप्त दर्रे की तरफ़ बढ़ गई, जहाँ से रास्ता सीधे दूसरे सूबे (राज्य) की सरहद की तरफ़ जाता था। पीछे आने वाले ज़ालिम पहाड़ों की धुंध और पेचीदा रास्तों में खोकर पीछे ही छूट गए।

रात ढल गई और सूरज अब आसमान के बीचों-बीच आ चुका था। उसकी सुनहरी धूप में सर्दियों की गुनगुनी गर्माहट घुली हुई थी। सुबह से लगातार चलने के बाद शमशेर और जाँबाज़ (बैल) भी थोड़ा हांफ़ने लगे थे। यावर ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी की और दूर एक घने, साएदार चिनार के दरख़्त (पेड़) की तरफ़ देखा, जिसके पास से ही नदी का एक छोटा सा चश्मा (झरना) फूटकर बह रहा था।

“ज़ून… यहाँ कुछ देर रुकते हैं। बैल भी थक गए हैं, और तुम्हें भी भूख लगी होगी,” यावर ने गाड़ी रोकते हुए बेहद मोहब्बत से कहा।

यावर ने फुर्ती से बैलों को गाड़ी से अलग किया और उन्हें पानी पीने के लिए चश्मे की तरफ़ छोड़ दिया। फिर उसने गाड़ी के पीछे से घास की एक साफ़ चटाई निकाली और उसे चिनार के पत्तों के साए में बिछा दिया। ज़ून ने अपनी पोटली से तांबे का एक छोटा सा कश्मीरी ‘समोवार’ (चाय केतली) निकाला। यावर ने चिनार की सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और पत्थरों को जोड़कर एक छोटा सा चूल्हा बना दिया। पलक झपकते ही आग सुलग उठी और कश्मीरी ‘कहवा’ (पारंपरिक चाय) उबलने लगी, जिसकी इलायची और केशर की ख़ुशबू ने पूरे माहौल को महका दिया।

खाने के नाम पर यावर के पास उसकी माँ की बंधी हुई सूखी रोटियाँ और अख़रोट की चटनी थी। यावर ने शरमाते हुए सूखी रोटी का एक टुकड़ा ज़ून की तरफ़ बढ़ाया, “ज़ून, मैं ठहरा एक अदना सा गाड़ीवान… मेरे पास इस सूखी रोटी के सिवा तुम्हें खिलाने के लिए कुछ नहीं है। माफ़ करना…”

ज़ून ने यावर की बात पूरी होने से पहले ही उसके हाथों से रोटी ले ले ली। उसने रोटी का एक निवाला तोड़ा, चटनी में डुबोया और बेहद सादगी से अपने हसीन होंठों से लगा लिया।

“यावर! इस सूखी रोटी में जो आज़ादी और तुम्हारे प्यार का स्वाद है ना, वो लाला रहमान के उस सोने के महल के पकवानों में भी नहीं था। यह ज़िंदगी का सबसे लज़ीज़ खाना है।”

ज़ून ने अपने हाथों से पहला निवाला बनाकर यावर के मुँह में डाल दिया। दोनों ने एक-दूसरे को देखते हुए, हँसते-मुस्कुराते हुए वह सादा सा खाना खाया।

मगर चाय का प्याला नीचे रखते ही अचानक यावर का चेहरा उतर गया। उसकी आँखों में एक गहरी उदासी छा गई। ज़ून ने उसकी आँखों के इस सन्नाटे को पढ़ लिया और पूछा, “क्या हुआ यावर? अचानक इतने ख़ामोश क्यों हो गए?”

यावर की आँख से एक आँसू टपक कर घास पर गिर पड़ा। उसने रुंधे हुए गले से कहा, “ज़ून… मैं तुम्हें उस नरक से तो निकाल लाया, लेकिन इस चक्कर में अपनी बूढ़ी माँ को उसी गाँव में तन्हा छोड़ आया। लाला रहमान और ज़मींदार के गुंडे जब मुझे ढूँढ नहीं पाएंगे, तो वे मेरी माँ पर ज़ुल्म करेंगे। मैं कैसा बेटा हूँ… अपनी मोहब्बत के लिए अपनी माँ को दांव पर लगा आया।”

ज़ून का दिल भी यह सुनकर काँप उठा। उसने यावर का हाथ कसकर थाम लिया और कहा, “नहीं यावर, हम अपनी खुशियों की बुनियाद माँ के आँसुओं पर नहीं रख सकते। चलो, हम वापस चलेंगे। जो होगा, देखा जाएगा।”

अभी दोनों इसी कश्मकश में थे और वापस मुड़ने की सोच ही रहे थे कि अचानक दूर पहाड़ी रास्ते से एक दूसरी बैलगाड़ी आती हुई दिखाई दी। उस गाड़ी को गाँव का ही एक पुराना बुज़ुर्ग डाकिया (रहीम चाचा) हांक रहा था। यावर ने जब ध्यान से देखा, तो उस गाड़ी के पिछले हिस्से में कश्मीरी शॉल ओढ़े एक बूढ़ी औरत बैठी थी। सफेद बालों वाली वो औरत कोई और नहीं, बल्कि

यावर की माँ थी!

यावर ने जैसे ही अपनी माँ को देखा, वह बदहवास सा गाड़ी से कूदा और माँ… माँ…चिल्लाता हुआ उसकी तरफ़ भागा। माँ ने भी जैसे ही यावर की आवाज़ सुनी, उसके बूढ़े जिस्म में जान आ गई। वह गाड़ी से उतरी और यावर को अपने सीने से लगा लिया। दोनों माँ-बेटे रो पड़े।

जब दोनों के आँसू थमे, तो रहीम चाचा ने मुस्कुराते हुए पूरी बात बताई। हुआ यह था कि जिस रात यावर ज़ून को लेकर भागा था, पूरे गाँव में हंगामा मच गया था। लाला रहमान के गुंडे सीधे यावर के घर पहुँचे थे। लेकिन यावर की माँ पहाड़ी औरत थी, वह कमज़ोर नहीं थी। उसने गुंडों को डराकर भगा दिया। पर वह जानती थी कि सुबह पुलिस आएगी और उसके सीधे-साधे बेटे को फंसा देगी।

तभी रहीम चाचा अपनी गाड़ी लेकर वहाँ पहुँचे। माँ ने तुरंत अपने घर का ज़रूरी सामान समेटा और रहीम चाचा से कहा—”रहीम भाई, मेरा बेटा अपनी जान पर खेलकर एक मासूम लड़की की इज़्ज़त बचाकर भागा है। वह गलत नहीं हो सकता। मुझे उसके पास ले चलो, मुझे मालूम है मुसीबत में वह किस रास्ते से जाता है।”* माँ को पता था कि यावर हमेशा इसी गुप्त पहाड़ी दर्रे वाले रास्ते से दूसरे सूबे की तरफ जाता है।

माँ ने यावर के आंसू पोंछे और फिर उसकी नज़र पीछे खड़ी ज़ून पर पड़ी, जो झिझकती और डरती हुई दूर खड़ी थी। ज़ून को डर था कि माँ उसे देखकर नफ़रत करेगी। लेकिन माँ ने अपनी बाहें फैला दीं। उसने ज़ून को पास बुलाया और उसके माथे को चूम लिया।

“तो तू ही है वो ज़ून, जिसके सुरों ने मेरे बेटे का दिल चुराया है? डर मत बेटी, आज से तू इस घर की इज़्ज़त और मेरी बेटी है। मेरा बेटा अगर किसी मजलूम की ढाल बना है, तो मुझे अपनी परवरिश पर नाज़ है।”

ज़ून माँ के पैरों से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी। उसके अनाथ जीवन में आज पहली बार किसी ने उसे माँ का आँचल दिया था।

अब यह सफ़र अधूरा नहीं था। अब उनके साथ माँ की दुआएँ और उनका पूरा परिवार था। रहीम चाचा ने हँसते हुए अपनी गाड़ी मोड़ी और वापस गाँव की तरफ चल दिए, यह वादा करके कि वह पीछे सब संभाल लेंगे।

सूरज ढलने को था और पहाड़ों पर शाम की सुनहरी लाली बिखर रही थी। पीर पंजाल की गगनचुंबी बर्फीली चोटियों पर जब सुबह और शाम का रंग मिला, तो पूरी वादी जैसे सोने की मानिंद चमक उठी। चारों तरफ़ देवदार के दरख़्तों पर जमी बर्फ़ पिघलकर मोतियों की तरह टपक रही थी। हवा में एक अजीब सा सुक़ून, ताज़गी और आज़ादी की ख़ुशबू थी।

यावर ने अपनी बैलगाड़ी की रास संभाली और ज़ून को अपने पास ही अगली सीट पर बिठाया। पीछे माँ आराम से बैठी अपनी माला फेर रही थी और अपने बच्चों को दुआएं दे रही थी।

ज़ून ने अपनी मखमली आवाज़ में एक नया गीत गुनगुनाया और अपना सर यावर के चौड़े और महफ़ूज़ काँधे पर रख दिया। यावर ने एक हाथ से रास थामी और दूसरे हाथ से ज़ून का हाथ कस लिया। शमशेर और जाँबाज़ की घंटियाँ अब और भी सुरीली लग रही थीं। अब वे किसी बंदिश या ख़ौफ़ के साए में नहीं थे। बैलगाड़ी आहिस्ता-आहिस्ता उस नई वादी के फूलों भरे रास्ते पर आगे बढ़ चली… जहाँ ज़िंदगी बेहद हसीन थी, मुकम्मल थी और सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत से लबरेज़ थी।

समाप्त

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