
राधा बोली कान्ह सौं,
करे मधुर मनुहार।।
धारो मेरा रूप तुम ,
गूँथों वेणी हार।।
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मैं पहनूँ तव पीत पट,
माथे मुकुट सजाय।।
जबहि बजाऊँ बाँसुरी,
तुम सुध-बुध बिसराय।।
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कृष्ण रूप राधा धरा,
मान सखी की बात।।
राधा टेरत बाँसुरी ,
सुध कान्हा बिसरात।।
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चितै सखी तन मुग्ध मन
राधा गई लजाय।।
लौटा कान्हा बाँसुरी,
बोली मन विगलाय।।
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कान्हा तुम कान्हा भले,
रूप मोहि यह भाय।।
धरो मोर पख माथ पर,
पीत वसन छवि छाय।।
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लीन्ही कान्हा बाँसुरी,
दियो तनिक मुस्काय।।
देख कृष्ण की चपलता,
राधा गई खिझाय।।
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ले गागर चल दी तबै ,
मोहन तब खिसियाय।।
खोंस मुरलिया फेंट में,
राधा पाछे धाय।।
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दीठि फेर ठाढ़ी रही,
कान्हा बहुरि मनाय।।
लीला राधा कान्ह की,
ब्रज मांहि रही छाय।।
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धन्य धरा ब्रज गाम की,
सुखद अतिहि अभिराम।।
नित ही रास रचत जहाँ,
युगल जोरि छवि धाम।।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




