साहित्य

मनुहार

वीणा गुप्त 

राधा बोली कान्ह  सौं,

करे मधुर मनुहार।।

धारो मेरा रूप  तुम  ,

गूँथों वेणी हार।।

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मैं  पहनूँ  तव पीत पट,

माथे  मुकुट सजाय।।

जबहि बजाऊँ बाँसुरी,

तुम सुध-बुध बिसराय।।

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कृष्ण रूप राधा धरा,

मान सखी की बात।।

राधा टेरत बाँसुरी ,

सुध कान्हा बिसरात।।

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चितै सखी तन मुग्ध मन

राधा गई लजाय।।

लौटा कान्हा  बाँसुरी,

बोली मन विगलाय।।

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कान्हा तुम कान्हा भले,

रूप  मोहि यह भाय।।

धरो मोर पख माथ पर,

पीत वसन छवि छाय।।

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लीन्ही कान्हा बाँसुरी,

दियो तनिक मुस्काय।।

देख कृष्ण की चपलता,

राधा गई  खिझाय।।

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ले गागर चल दी तबै ,

मोहन तब खिसियाय।।

खोंस मुरलिया फेंट में,

राधा पाछे  धाय।।

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दीठि फेर ठाढ़ी रही,

कान्हा बहुरि मनाय।।

लीला राधा कान्ह की,

ब्रज मांहि रही छाय।।

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धन्य धरा ब्रज गाम की,

सुखद अतिहि अभिराम।।

नित ही रास रचत जहाँ,

युगल जोरि छवि धाम।।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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