साहित्य

ग़ज़ल समंदर नहीं है देखा

डॉ. शिवनाथ सिंह

देखा है तुमने हमको, मेरे अंदर नहीं है देखा*

*सबको समेट ले, वो समंदर नहीं है देखा..*

 

बेदर्द आंधियों में मुस्कुराता रहा था जो,

टूटा जो और बिखरा, वो पत्थर नहीं है देखा..

 

आँँखों में नमी थी मगर होंठों पे हंसी थी,

इतना सब्र करे वालाह , कोई कलंदर नहीं है देखा..

 

वादों के ताजमहल बनाये हर गली में

पूजित हो नींव पत्थर , वो घर नहीं है देखा..

 

भूखे को रोटियों का देता रहा निवाला,

दौलत के बाजारों में, वो लंगर नहीं है देखा..

 

बच्चों की खातिर रात-दिन जागे जो बाप माई,

ममता लुटाने वाला , कोई मंजर नहीं है देखा..

 

झूठोँ के तख्त पर बैठे मिलेंगे लोग,

सच केा जो साथ दे , वो लश्कर नहीं है देखा..

 

चाहें तो कलम की धार से जमाने को मोड दे ,

हिम्मत बढ़ाने वाली, खबरे नहीं है देखा..

 

संग संग दिए जो चल कंधा लगाने को ,

पड़ने पर वक़्त ज़ालिम , हमसफर नहीं है देखा..

 

रिश्तों के मेलों में बिके जज्बात सारे अब ,

खुद से मोहब्बत करे जो , कोई रहबर नहीं है देखा..

 

*शिव* कहता है सुनो अब यार कान खोल के

झांको जो अपने अंदर , दिलबर नहीं है देखा..

 

 

डॉ. शिवनाथ सिंह ‘शिव’*

*रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच, *

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