
सड़कें रोईं, गलियाँ रोईं, रोया मालवीय नगर का बाज़ार,
चंद सिक्कों की ख़ातिर तुमने, लील लिया हँसता संसार।
जब तक ये लालच की इमारतें, अवैध रूप से तनेगी,
तब तक किसी न किसी माँ की बेटी, यूँ ही वेदी पर चढ़ेगी।
दिल्ली के उस अंधे सिस्टम की, यह कैसी ज़ालिम रीती है?
जिसकी भेंट चढ़ी इक्कीस जानें, और समाज की बेटी है।
भ्रष्टाचार की उस आग ने, कितने ही घर उजाड़ दिए,
एक हँसती-खेलती क़िस्मत के, पन्ने ही उसने फाड़ दिए।
श्रुतिका! तुम एक तारा बनकर, अंबर में अब मुस्काओगी,
पर माँ-पापा के सूने आँगन में, तुम याद बहुत ही आओगी।
ईश्वर दे बल उस परिवार को, जो इस दुःख में चूर है,
न्याय मिले उस मासूम को, जो अब हमसे बहुत दूर है।
जब शॉर्ट सर्किट की चिंगारी ने, बेसमेंट को घेरा था,
पल भर में उस इमारत में, मौत का हुआ बसेरा था।
न कोई इमरजेंसी एग्ज़िट था, न ज़हरीली हवा का निकास था,
काँच की बंद उन खिड़कियों में, घुटता हर एक का साँस था।
लपटों से ज़्यादा धुएं ने, फेफड़ों पर वार किया,
मदद की हर एक चीख को, उस धुएं ने लाचार किया।
इक्कीस ज़िंदगियाँ बुझ गईं, तंत्र की इस मनमानी से,
कई घरों का चिराग बुझा, इस सिस्टम की लापरवाही से।
बंद करो हाँ बंद करो ! अब तो ये व्यापार रोको,
नियम तोड़ने वाले इन हत्यारों को, बीच राह में टोको।
छह कमरों का लाइसेंस लेकर, पच्चीस कमरे तान दिए,
चंद रुपयों की ख़ातिर देखो, पैसों पर ईमान दिए।
‘बेड एंड ब्रेकफास्ट’ के नाम पर, मौत का कुआँ सजाया था,
नियम-क़ायदे ताक पर रख, कैसा व्यापार चलाया था!
न दमकल की एनओसी (NOC) थी, न कोई परमिशन थी,
भ्रष्टाचार के साए में, बस नोट छापने की धुन थी।
एक संकरा सा रस्ता था, बस आने और जाने का,
इंतज़ाम कोई था ही नहीं, विपदा में जान बचाने का।
ज्योति बरनवाल
नवादा (बिहार)



