
माँ शारदे! वरदान दीजिए,
मन में नव अभियान दीजिए।
अज्ञानों का तम हर लीजिए,
ज्ञान-ज्योति का दान दीजिए॥
वीणा की झंकार मधुर हो,
वाणी का व्यवहार मधुर हो।
शब्द-शब्द में भाव सजाकर,
जीवन का श्रृंगार कीजिए॥
माँ शारदे! वरदान दीजिए…
श्वेत कमल-सी बुद्धि निर्मल,
सत्य-पथों पर मन हो अविचल।
विनय-विवेक सुधा बरसाकर,
जीवन को उज्ज्वल कीजिए॥
माँ शारदे! वरदान दीजिए…
लेखनी में ओज प्रदान कर,
जनहित का संकल्प महान कर।
राष्ट्र-प्रेम की ज्योति जगाकर,
भारत का सम्मान कीजिए॥
माँ शारदे! वरदान दीजिए…
मन से सारे द्वेष मिटाकर,
प्रेम-सुमन हर ओर खिलाकर।
करुणा, सेवा, सत्य सिखाकर,
मानवता का मान कीजिए॥
माँ शारदे! वरदान दीजिए…
जयति वीणापाणि वरदायिनी,
जय जय माँ सरस्वती।
भक्ति-भाव से शीश नवाकर,
ज्ञान-सुधा का दान दीजिए॥
मां शारदे! वरदान दीजिए।।
*स्वरचित मौलिक वंदना*
*कवि:दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




