
रूप मिला तो यौवन अपना, तूँ ऐसे नीलाम न कर।
मातृशक्ति की मर्यादा को, इतराकर बदनाम न कर।।
तेरी गोंद विधाता पलते, भूल चुकी अंगड़ाई में-
बाजारू सामान नहीं तुम,ऐसा कोई काम न कर।।
गणिकाओंं सी लगा ठुमकियां,सरेआम तुम नाच रही।
युवाशक्ति दिग्भ्रमित तुम्हीं से,मादकता को जाँच रही।।
जिसका पानी उतर गया हो,उससे क्या उम्मीद करें –
कोठेवाली बनीं निरापद,तुम्हें तनिक भी लाज नहीं।।
समयचक्र के उलटफेर में,जब यौवन ढल जाएगा।
मेकअप तेरा साथ न देंगें,संगी ही छल जायेगा।।
सत्कर्मों की सुंदरता सत,दिन दिन नित्य निखरती है –
गीता का सिद्धांत यही है,करनी का फल पायेगा।।
– डॉ.उदयराज मिश्र




