साहित्य

सत्कर्मों की सुंदरता

- डॉ.उदयराज मिश्र

रूप मिला तो यौवन अपना, तूँ ऐसे नीलाम न कर।

मातृशक्ति की मर्यादा को, इतराकर बदनाम न कर।।

तेरी गोंद विधाता पलते, भूल चुकी अंगड़ाई में-

बाजारू सामान नहीं तुम,ऐसा कोई काम न कर।।

 

गणिकाओंं सी लगा ठुमकियां,सरेआम तुम नाच रही।

युवाशक्ति दिग्भ्रमित तुम्हीं से,मादकता को जाँच रही।।

जिसका पानी उतर गया हो,उससे क्या उम्मीद करें –

कोठेवाली बनीं निरापद,तुम्हें तनिक भी लाज नहीं।।

 

समयचक्र के उलटफेर में,जब यौवन ढल जाएगा।

मेकअप तेरा साथ न देंगें,संगी ही छल जायेगा।।

सत्कर्मों की सुंदरता सत,दिन दिन नित्य निखरती है –

गीता का सिद्धांत यही है,करनी का फल पायेगा।।

 

– डॉ.उदयराज मिश्र

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