साहित्य

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस विशेष

दिनेश पाल सिंह 'दिव्य

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस विशेष


शीर्षक : “विश्वगुरु भारत का योग”

ऋषियों की तपोभूमि से जो अमृतधारा बहती है,

योग वही है, जो जीवन में नव चेतना भर देती है।

वेदों के पावन मंत्रों से जिसका नाता गहरा है,

भारत की इस दिव्य विरासत पर जग सारा ठहरा है॥

 

पतंजलि की वाणी में जो जीवन का विज्ञान मिला,

तन को शक्ति, मन को शांति, आत्मा को सम्मान मिला।

यम-नियम की राह दिखाकर संयम का उपहार दिया,

भटके हुए मानव को फिर जीने का आधार दिया॥

 

हिमगिरि की कंदराओं में ऋषियों ने जो ध्यान किया,

सत्य और आत्मबोध हेतु कठिन तप का गान किया।

उस तप की पावन ज्योति आज भी जग को राह दिखाती है,

योग साधना की सरिता हर मन का तम हर जाती है॥

 

यह केवल व्यायाम नहीं, जीवन का संपूर्ण विधान है,

श्वासों का संगीत मधुर, आत्मा का अभिनंदन-गान है।

जब-जब मानव पथ भूला है, योग ने उसको थाम लिया,

अंधकार के घोर क्षणों में आशा का दीपक थाम लिया॥

 

आज विश्व के कोने-कोने में भारत का सम्मान बढ़ा,

योग दिवस के शुभ अवसर पर गौरव का अभियान बढ़ा।

जिस संस्कृति को कभी जग ने सीमित समझ उपहास किया,

उसी योग ने आज विश्व का हृदय जीत इतिहास किया॥

 

आओ मिलकर प्रण यह लें, योग बने जीवन का सार,

स्वस्थ शरीर, निर्मल मन हो, उज्ज्वल हो हर एक विचार।

भारत की इस पुण्य धरोहर का हम सब गुणगान करें,

योगमय होकर विश्वशांति का सुंदर नव अभियान करें॥

 

विश्वगुरु भारत की महिमा युग-युग तक गाई जाएगी,

ऋषियों की यह अमर साधना सदा अमर कहलाएगी।

मानवता के मंगल हेतु यह संदेश सुनाता योग,

“स्वयं प्रकाशित बनो, जगत को प्रेम-पथ दिखलाता योग।”॥

 

स्वरचित मौलिक कविता

रचनाकार : दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

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