
वो प्यार का पहला ख़त जब तुझको लिखने बैठा था,
दिल धड़क रहा था ऐसे जैसे कोई सपना ऐंठा था।
कागज़ पर तेरे नाम की जब पहली स्याही उतरी थी,
मेरी हर धड़कन में जैसे एक नई सरगम बिखरी थी।
लिखा था मैंने धीरे-धीरे, “तुम मुझको अच्छी लगती हो”,
सूनी राहों की तन्हाई में जैसे चुपके सजती हो।
तेरी हँसी सुबह की किरण, तेरी बातें शाम सी हैं,
मेरे दिल के वीराने में तुम खिलती मुस्कान सी हो।
जब-जब तेरी यादें आतीं, मन में फूल खिला करतीं,
सूखे मौसम की शाखों पर आशा बनकर मिला करतीं।
न चाँद की चाहत रखता हूँ, न तारों का हार मुझे,
बस तेरा साथ मिले जीवन भर, इतना सा उपहार मुझे।
अगर कभी तुम पढ़ लो इस दिल की अनकही बातों को,
समझोगी तुम प्रेम छिपा है मेरे हर जज़्बातों को।
वो प्यार का पहला ख़त था, जिसमें दिल का हाल लिखा,
तेरे नाम की महक से मैंने अपना हर ख़्वाब लिखा।
तू हाँ कह दे तो जीवन में मधुमास उतर आएगा,
मेरे गीतों का हर सुर फिर तेरा नाम ही गाएगा।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




