वसुंधरा तू धैर्य की, अनुपम सुंदर शान।
तेरी गोदी में बसा, जीवन का सम्मान।।
हरी चुनरिया ओढ़कर, करती जग श्रृंगार।
तेरे आँचल से मिले, खुशियों का संसार।।
नदियाँ कल-कल गुनगुनाएँ, पर्वत करें पुकार।
वन-उपवन की छाँव से, महके हर परिवार।।
अन्नपूर्णा बन सदा, भरती सबके थाल।
तेरे कारण ही मिले, जीवन को खुशहाल।।
सूरज की किरणें तुझे, प्रतिदिन करें प्रणाम।
चंदा भी शीतल बने, लेकर तेरा नाम।।
सहती शीतल, ताप सब, करती नहीं गुमान।
तेरे जैसा धैर्य का, मिलता कहाँ प्रमाण।।
आओ मिलकर आज हम, लें मन में यह ठान।
स्वच्छ रखें इस धरा को, बढ़ाएँ इसका मान।।
पेड़ लगाएँ प्रेम से, रखें सदा उपकार।
वसुंधरा मुस्काए फिर, सुंदर हो संसार।।
स्वरचित/ मौलिक
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़




