साहित्य

अभिभावक: संस्कृति का आधार, अनमोल धरोहर व जीवन मूल्यों के प्रेरणा स्रोत

सुरेशचन्द्र जोशी "

अभिभावक: संस्कृति का आधार, अनमोल धरोहर व जीवन मूल्यों के प्रेरणा स्रोत।

 

संस्कृति मान्यताओं परंपराओं व जीवनशैली से मिलकर बनी होती है। यह भौतिक व आध्यात्मिक किसी भी प्रकार की हो सकती है। मनुष्य ही संस्कृति का निर्माता है और संस्कृति ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। यह हमको जीवन जीने का मार्ग बताती है।

अभिभावक हमारी संस्कृति के आधार हैं। अभिभावक ही बच्चों को सही राह दिखाते हैं तथा उनको संस्कार देने के लिए भी वे ही उत्तरदायी हैं। अनमोल धरोहरों से परिचित कराने के साथ उन्हें जीवन के मूल्यों से अवगत कराना भी अभिभावकों का ही कार्य है।

जीवन के मूल्य व अनमोल धरोहर क्या हैं:

१. बच्चों को अपने से बड़ों का आदर करने व कनिष्ठों को प्यार देने तथा सच बोलने, नारियों का सम्मान करने के बारे में बताना अर्थात यह संस्कार देना अभिभावकों का कार्य ही नहीं उत्तरदायित्व भी है।

२. त्यौहारों को मिलकर मनाने तथा पारंपरिक व पारिवारिक रीति रिवाजों को मिलकर मनाने की शिक्षा देना भी अभिभावकों का कर्तव्य है।

३. इसके अतिरिक्त परिवार व परिवार के सदस्यों की खुशी के लिए अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का त्याग करना सिखाना भी एक अच्छे अभिभावक का कार्य है।

४. परिवार के बड़े बूढ़ों या बुजर्गों का अनुभव परिवार की सबसे बड़ी पूंजी होता है। जो आज बुजुर्ग हैं वे कभी तरुण अर्थात युवा रहे होंगे। उनके पास अपने बुजुर्गों की सलाह और अपने जीवन में स्वयं अर्जित किये अनुभवों का एक अथाह भंडार होता है। जिससे उनके आगे की पीढ़ी उनका भरपूर लाभ उठा कर जीवन की कठिनाइयों का बहुत आराम से सामना कर सकते हैं।

५. अभिभावक अपने उदाहरणों से बच्चों को इस बात की शिक्षा देते हैं कि परिवार को हर परिस्थिति में जोड़कर रखना व एक दूसरे का साथ कभी भी न छोड़ना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

६. अपने परिवार के इतिहास तथा परिवार के सदस्यों की आदतों आदि को आगामी पीढ़ी में संचार का कार्य भी अभिभावक की जिम्मेदारी है।

इसे हम इस प्रकार भी समझ सकते हैं। अगर माता-पिता को अपनी परम्परा, संस्कृति, रीति-रिवाजों, त्योहारों तथा परिवार के इतिहास का ज्ञान हो और वे समय समय पर अपने बच्चों को इनसे अवगत कराते रहते हैं तो उनका अपने परिवार, परिवार के सदस्यों व समाज के साथ लगाव व जुड़ाव अनुभव करते हैं।

उक्त से यह स्वतः स्पष्ट है संस्कार, संस्कृति, अनमोल धरोहरों व जीवन मूल्यों के वाहक हमारे अभिभावक ही होते हैं।

 

सुरेशचन्द्र जोशी “सहयोगी”, उत्तराखंड, पिथौरागढ़।

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