
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।
मुक्तामणियाँ-सम बूँदें अब,
वसुधा पर बरसे पानी।।
आशातीत अवनि अधरों की,
तृप्त हुईं है प्यास।
आतप सहकर दग्ध हुई थी,
पूर्ण हुई अब आस।।
छतरी लेकर निकल पड़े हैं,
करने सब अगवानी।
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।।
मस्त मयूरा नर्तन करता,
झींगुर ठोके ताल।
ठुमक-ठुमक कर नाच रहे सब,
दादुर है वाचाल।।
हर्षित होकर तीव्र सुरों में,
चातक गाए मनमानी।
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।।
चतुर चपल चपला चमके जब,
विरहिन कहे पुकार।
घर आ जा मनमीत मुसाफिर,
तड़पे जिया अपार।।
पूछ रही है आतुर स्वर में,
व्याकुल हो वनिता बानी।
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।।
नद-नाले संतृप्त हुए हैं,
हरियाली चहुँओर।
तप्त हृदय हैं आनंदित सुन,
घन गर्जन घनघोर।।
लह-लह करती फसलें होंगी,
हलधर ने अब है ठानी।
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।।
पहली बारिश की बूँदों से,
मन में उठे हिलोर।
टोली में सब निकल पड़े हैं,
बालक हुए विभोर।।
सुख-दुख में समभाव रहें हम,
मौसम तो आनी-जानी।
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।।
आह्लादित हो लोग-लुगाई,
गाएँ मेघ-मल्हार।
रिमझिम बारिश बौछारों से,
भींगे खेत कछार।।
नव पल्लव बूँदों को चूमें,
पादप हैं अब धानी।
अंबुद ने आवाज लगाई,
दौड़ पड़ी बरखा रानी।।
© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




