साहित्य

बादल विजली बाल कविता

डॉ उषा अग्रवाल

बादल बिजली चंचल चमके।

नभ में दिखती जब वह दमके।।

रिमझिम वरखा धरती बरसे।

काले बादल विजली चमके।।

 

रानी गुडिया छपछप करती।

ऑंगन में जब पानी भरती।।

उसे देख कर मुन्ना आया।

उछल कूद कर वह भी लपके।।

 

पानी जब सड़कों पर बहता।

काग़ज कश्ती वह तैराता।।

सुन्दर सी जब कश्ती बनती।

दूर चलाकर तब वह रुकती।।

 

बादल काले नभ में छाए।

मुन्ना मुन्नी सबको भाए।।

घटा रही घनघोर बरसती।।

मस्ती में अब हैसरस्वती।।

 

स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

 

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

छतरपुर मध्यप्रदेश

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