
भोली-सी चिड़िया आंगन में,
अब कभी नहीं फुदकती है।
चीं-चीं की आवाज नहीं आती,
मस्ती के गीत नहीं सुनाती है।
अब आंगन नहीं है घरों में,
नहीं मिलता खाने को दाना।
अब लोग नहीं हैं फुर्सत में,
नहीं कोई देता पानी दाना।
अब चून्नू-मुन्नू मोबाइल देखते,
घर से बाहर नही निकलते।
अब चिड़ियों से प्यार नहीं रहा,
अब बच्चे प्रकृति से दूर रहते।
अब वह कोमल बात नहीं,
चिड़ियों को देता साथ नहीं।
अब वे बाग-बगीचे रहे नहीं,
सुबह-सबेरे कलरव होता नहीं।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज



