जब मौन चेतना मुखर होती।
हर साँस संगीत से सजी होती।
मिट जाता द्वेष का सारा भाव।
बस बुद्धि मात्र नहीं दौड़ा करती।
जड़ता की गहरी निंद्रा होती।
मन पक्षी की फेरी होती रहती।
जग जाती आलौकिक शक्ति।
दिव्य क्षण की चेतना जगती।
यही आत्मा का होता प्रकाश।
जो जागृत अवस्था में होती।
ले जाती अंधकार को पार।
गहरी स्वयं से साक्षात्कार होती।
सूने मन का स्पंदन होता रहता।
सूने नयनों की गरिमा भी होती।
हो जाता सत्य का अनुभव भी।
रोम रोम की आनन्दित गरिमा होती।
जल उठती आंतरिक मशाल।
बिन आहट की दस्तक होती।
बोध नाम ही कहलाती चेतना ।
धड़कती खामोश लहर होती।
घुलने लगती गंध तन मन से।
रोम रोम से मुलाकात होती।
नयनों के पीछे है तो कोई भी।
स्वयं की देहरी जाले बुनती होती।
मीना तिवारी
पुणे




