साहित्य

चलते चलते 

प्रिया काम्बोज

पीछे मुड़कर न देखा एक बार भी चलते-चलते

रह गयी बात जुबां पर अधूरी कहते-कहते

 

दर्द दिया कुछ इस तरह शीशा- ए- दिल तोड़कर

टुकड़ों को उठाते रहे हम दर्द सहते -सहते

 

खुदगर्ज बन गया वो इतना हमनवां मेरा

ना पिघला ए दिल अश्क देख मेरे बहते-बहते

 

वो मुस्कुराते रहे गैरों की बाहों में जाकर

जल के ख़ाक हो गये हम सुलगते-सुलगते

 

ताउम्र तेरे दीदार को तरसते रहे हम

आंखें नम ही रही राह तेरी तकते -तकते

 

प्रिया काम्बोज ✍️

सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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