
पीछे मुड़कर न देखा एक बार भी चलते-चलते
रह गयी बात जुबां पर अधूरी कहते-कहते
दर्द दिया कुछ इस तरह शीशा- ए- दिल तोड़कर
टुकड़ों को उठाते रहे हम दर्द सहते -सहते
खुदगर्ज बन गया वो इतना हमनवां मेरा
ना पिघला ए दिल अश्क देख मेरे बहते-बहते
वो मुस्कुराते रहे गैरों की बाहों में जाकर
जल के ख़ाक हो गये हम सुलगते-सुलगते
ताउम्र तेरे दीदार को तरसते रहे हम
आंखें नम ही रही राह तेरी तकते -तकते
प्रिया काम्बोज ✍️
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




