साहित्य

सेवा तीर्थ 

डॉ. प्रभा जैन

जाते है कितने ही तीर्थ

करते देव पूजा और मनोरंजन,

कभी घूम आइये सेवा तीर्थ

बोल सुनने को बेकरार कोई।

 

तरस गयी जिनकी आँखें

देखने और सुनने को दो बोल,

पाला-पोसा बड़ा किया

अपने हिस्सा भी दिया ।

 

“क्या किया तुमने हमारे लिये ”

कह किया अपमानित बार बार

भूल गये वो है माता-पिता

जन्म देने वाले तुम्हें।

 

अपने जीवन का चिराग माना

देख पल-पल खुश हुए,

जैसे आज तुम खुश होते

अपनी संतान को निरख कर।

 

जीवन भर की पूंजी तुम

बैचैन होते वो

पल भर को जब होते ओझल,

और निकाला तुमने जैसे निकलता कोई मख्खी दूध से……

 

छोड़ आये तुम जहाँ

बनाया उन्होंने सेवातीर्थ,

पैर छू क्षमा मांग

लाओ वापस उन्हें घर।

 

है वो छायादार वृक्ष

अपनेपन की बोली से वंचित,

दे दो उन्हें सहारा

प्यार से उनको अपनाकर।

 

अपनाघर कहो या वृद्धआश्रम

कितना भी सुख दे वो

पर क्या अपने परिवार जैसा बेटा बहू पोता का सुख मिल सकता क्या।

 

टूटती उम्मीद और हटता विश्वास

क्या उनकी उम्र, बीमारी हटा सकता है क्या….

 

क्या अपनों को देख चमकती आँखे,

वो उमड़ता स्नेह आ सकता है क्या।

 

डॉ. प्रभा जैन “श्री ”

देहरादून

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