साहित्य

ढूंढ लेंगे रास्ता 

वीणा गुप्त 

हम चले जिस ओर भी,

ढूंढ लेंगे रास्ता।

नाकामियों से यारों अपना,

नहीं कोई वास्ता।

मंजिलों के सपन सुनहरे,

इन आंखों में पल रहे।

करके रहेंगे पूरा इन्हें,

हों वज्र कितने गिर रहे।

राह सच की है कठिन,

आसान झूठ की डगर।

पोल लेकिन जब खुले,

न मिला पाए खुद से नज़र।

विपद कसौटी पर कसकर ही,

मिलती है सुख की तदबीर।

कोई मिटा न पाए जिसे,

खींचें हम ऐसी लकीर।

नेक है नीयत हमारी,

साथ हमारे हैं भगवान्।

त्याग,प्रेम,विवेक जिसमें,

वही है सच्चा इंसान।

रोशन करेंगें हम जहां,

ऐसा अपना नूर है।

मरण का करें वरण हंसकर,

हम तो वही शूर हैं।

बने जो मानवता का रक्षक,

वही तो महान है।

जीवन हो सार्थक तभी,

यह ईश का वरदान है।

प्रभु देते साथ उसका,

जिसे खुद पर विश्वास है।

विश्वास ही निराशा-पथ पर

आशा की वतास है।

नहीं सीखा रुकना जिसने,

नहीं हार जो मानता।

बाधाओं को विवश हो,

देना ही होगा रास्ता।

नाकामियों से यारों अपना

नहीं कोई वास्ता।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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