
हे गुरुवर! मुझको अपनाकर,
जीवन-पथ आलोकित कर दो।
अंतरतम के घोर तमस में,
ज्ञान-ज्योति प्रज्वलित कर दो॥
भटकी हूँ मैं सांसारिकता में,
राह नहीं अब सूझ रही है।
चरण-कमल की शीतल छाया,
जीवन की बस पूँजी यही है॥
मन चंचल, संशय से घिरकर,
डगमग-डगमग चलता रहता।
नाम तुम्हारा नाव बनाकर,
भवसागर से पार उतरता॥
तुमने तो हर पल पुकारा,
मैं ही तुमको भूल गयी थी।
दया-दृष्टि अब ऐसी रखना ,
फिर न तुमसे दूर होऊँ कभी भी॥
श्रद्धा मेरी श्वासों में बसे,
और सेवा मेरा धर्म कहलाए।
करबद्ध निवेदन करूँ हमेशा ,
हर कर्म गुरु को अर्पित हो जाए॥
गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर,
बस इतना वरदान मिले।
जब तक प्राण रहें इस तन में,
आपके चरणों का अनुराग मिले॥
तुम ही पथ हो, तुम ही साथी,
तुम ही हो जीवन के आधार।
गुरु-कृपा की एक बूँद से,
हो जाऊँ मैं भवसागर पार॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




