
हसना भूल गए
जीना सीख गए
नई रोशनी ने
आँखें खोल दी
समझना था खुदको
सबको भूल गए
सोये जागे
पर रोना भूल गए
साथ के लिए तरसते थे
अकेला रहना सीख गए
खुदसे नफरत थी
मोहोब्बत सिख गए
उजले के लिए तरसते
अंधेरे में रहना सीख गए
खुदको भुला के
सबका होना सिख गए
खुदको भूल गए
दिल को हरा गए
आज़ादी की तलप में
कैद हो गए
खुदको महसूस करके
सबके हो गए ।।
– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ(मध्यप्रदेश)




