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*(द्वितीय अंक – विश्वासघात)*
घर जिसने खड़ा किया,
वही आज बेघर है।
सबको छाँव देने वाला,
खुद धूप का सफ़र है।
जिसके कंधों पर चढ़कर,
सबने मंज़िल पाई।
आज उसी की आँखों में,
किसने धूल उड़ाई?
जब तक देता ही रहा,
सबका वह अपना था।
अपने हिस्से जीने निकला,
तब से ही सपना था।
अपने ही जब बदल गए,
किससे करे शिकायत?
घर को मंदिर मान लिया,
मिली वहीं विरासत।
घाव छिपाकर हँसता है,
दर्द कभी न जताता है।
घर का बड़ा बेटा अक्सर,
चुप रहकर टूट जाता है।
फिर भी दीपक बनकर,
घर-आँगन जगमगाता।
अपने दर्द को पीकर,
सबको राह दिखाता।
टूटेगा तो याद रखो,
घर भी बिखर जाएगा।
घर का सबसे बड़ा बेटा,
लौट फिर न पाएगा।
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*
*सम्पर्क सूत्र 8279709465*




