
तुमने मुस्कुराकर ताना मारा
“तुम झूठ बहुत बोलती हो…”
मैंने भी मुस्कुराकर कहा
“हाँ, क्योंकि हर सच रिश्तों की उम्र नहीं बढ़ाता।”
अगर हर बार सच ही कह देती,
कि तुम्हारी बेरुख़ी मुझे रुला जाती है,
कि तुम्हारी चुप्पियाँ भीतर तक तोड़ देती हैं,
तो शायद हम आज यूँ साथ बैठे भी न होते।
कुछ झूठ इसलिए नहीं बोले जाते
कि किसी को धोखा दिया जाए,
कुछ झूठ इसलिए जन्म लेते हैं
कि उम्मीद की साँसें चलती रहें,
बातचीत की लौ बुझने न पाए।
मैं कह देती हूँ “मैं ठीक हूँ,”
जबकि आँखें सारी रात भीगी होती हैं।
कह देती हूँ “कोई बात नहीं,”
जब दिल उसी बात पर टूट रहा होता है।
ये झूठ नहीं…
रिश्ते को बचाने की आख़िरी कोशिशें होती हैं।
सोचो, अगर हर सच बिना परदे के बोल दिया जाए,
हर शिकायत, हर दर्द, हर अधूरापन,
तो संवाद सबसे पहले मरता है,
और उसके पीछे-पीछे
वो रिश्ते भी, जो दूर तक चल सकते थे।
इसलिए मेरे झूठों को
मेरी बेवफ़ाई मत समझना।
ये उन धागों की तरह हैं
जो बार-बार टूटते रिश्ते को
चुपचाप फिर से बाँध देते हैं।
हाँ… मैं झूठ बोलती हूँ,
पर इतना याद रखना
मेरा हर झूठ तुम्हें खोने के डर से जन्म लेता है,
और मेरा हर सच
सिर्फ़ तुमसे बेइंतहा प्रेम करता है।
©® डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’
ग्वालियर (मध्य प्रदेश )


