
लिखो आप छंद और गीत,
मैं तो अपने मन की बात लिखता हूं।
नियम और मात्रा से हूँ अनजान मगर,
बस दिल के भाव लिखता हूं।
कलम न पूछे लफ्जों की भाषा,
मैं तो अपने मन की बात लिखता हूं।
जब होती है खामोश कविता,
तब उसकी बात में लिखता हूं।
नहीं पता मुझे भेद लेखन के,
सच्ची बात मैं लिखता हूं।
मैं तो कहता हूं तेरे मन की बात,
और मेरे दिल की बात लिखता हूं।
तुम निभा लो परंपरा लेखन की,
मैं हर दिल की बात लिखता हूं।
मैं क्या जानूं ज्ञान और सम्मान,
मैं तो अपने आवारा पन,
अकेले पन पे लिखता हू !!!
स्वरचित,
✍🏼पंकज एस पाण्डेय,शिकोहाबाद




