
मैं प्रकृति हूं कोमल मन मेरा सुंदर हरी-भरी वादियां,
उद्विग्न आहत मन की तेरे बन जाती हूं मरहम कभी ।
मेरे झरनों की सरगम को सुन सजे होठों पर तेरे गीत है,
मेरी सुषमा निरख निरख तेरेहृदय ने कविता सहज कहे,
उपमा नहीं अनुपम हूं मैं ,यह बात तुमने भी मानी है ।
बारिश की बूंदों से सजी में पत्ता पत्ता निखर गई ,
मैं सजी श्रृंगार मिला तुम्हें मैंने राग तुममें प्रणय भरी,
ये कहा नहीं कभी मगर मुझसे हीं तेरी बहार है।
पीड़ाएं पा तुमसे भी मैं उमगि उमंग मिलती रही ,
उपकरण उगले विष तेरे हुई कांति मेरी मलीन भी ,
फिर भी ख्याल रहा तेरा इसलिए सब स्वीकार है।
तेरे पापा विष को समेट में सिन्धुद्वारे भी गई ,
पर तुम न सुधरे हे! मनुज़ मुझे कर रहे हैं अब भी दूषित,
नहीं आज भी तूमको लगी मेरे दुखित मन की थाह है।
मैं सिंधु जैसी सरल नहीं और नीलकंठ भी मैं नहीं ,
कैसे करूं कितना सहन सुधरो यही चेतावनी !
वरना भुगतना है तुम्हें परिणाम कुछ ज्यादा ही है ।
मैं प्रकृति हूं कोमल मन मेरा सुंदर हरी-भरी वादियां।
संगीता श्रीवास्तवा।




